राजस्थान में किसान आंदोलन

विजयसिंह पथिक को राजस्थान में किसान आंदोलन का जनक कहा जाता है। राजस्थान में किसान आंदोलन (Rajasthan mein Kisan Aandolan) की शुरुआत सर्वप्रथम उस समय के मेवाड़ रियासत से हुई थी।

राजस्थान में किसान आंदोलन

1. बिजोलिया किसान आंदोलन

  • मेवाड़ राज्य में बिजोलिया (भीलवाड़ा जिला) ठिकाने की स्थापना राणा सांगा के समय अशोक परमार द्वारा की गई थी।
  • बिजोलिया आन्दोलन राजस्थान का प्रथम संगठित किसान आन्दोलन था और यह पूर्णतया अहिंसात्मक आंदोलन था।
  • साधु सीतारामदास को बिजोलिया किसान आंदोलन का जनक कहा जाता है।
  • इस आंदोलन का कारण जागीरदारों द्वारा अधिक लाग-बाग वसूलना था।
  • बिजोलिया की जनता से 84 प्रकार की लाग-बाग ली जाती थी।
  • जागीरदारों ने 1903 ई. में जनता पर चँवरी कर (प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर दिया जाने वाला कर) लगा दिया था।
  • साधु सीतारामदास, विजयसिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, रामनारायण चौधरी, हरिभाई किंकर, जमनालाल बजाज, हरिभाऊ उपाध्याय, फतेहकरण चारण, ब्रह्मदेव, नारायण पटेल, नानजी व ठाकरी पटेल आदि ने बिजोलिया आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
  • 1897 ई. में ऊपरमाल क्षेत्र (बिजोलिया) के लोगों ने मेवाड महाराणा फतेहसिंह से जागीरदारों के जुल्मों के विरुद्ध कार्य करने के लिए नानजी व ठाकरी पटेल को भेजा किन्तु महाराणा ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
  • पृथ्वी सिह द्वारा तलवार बंधाई कर (नया ठाकुर बनने पर दिया जाने वाला कर) लागू कर दिया गया।
  • तलवार बंधाई कर के विरोध में साधु सीतारामदास, फतहकरण चारण व ब्रह्मदेव के नेतृत्व में किसानों ने 1913 ई. में आंदोलन करते हुए भूमिकर नहीं दिया। इस आंदोलन में धाकड़ जाति के किसान सर्वाधिक संख्या में थे।
  • 1916 ई. में साधु सीतारामदास के आग्रह पर विजयसिंह पथिक (भूपसिंह) ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभाला।
  • इस आन्दोलन का नेतृत्व 1913 से 1916 ई. तक साधु सीतारामदास, 1916 से 1927 ई. तक विजयसिंह पथिक तत्पश्चात जमनालाल बजाज व हरिभाऊ उपाध्याय ने किया था।
  • 1922 ई. में किसानों व ठिकाने के बीच हुए समझौते के तहत 84 में से 35 लाग माफ कर दी गई।
  • 1927 ई. में पथिकजी इस आंदोलन से पृथक हो गये।
  • 1941 ई. में मेवाड़ के प्रधानमंत्री टी. राघवाचार्य ने राजस्व मंत्री डॉ. मोहनसिंह मेहता को बिजोलिया भेजकर किसानों की माँगे मानकर जमीनें किसानों को वापस दे दी।
  • इस प्रकार लगभग 44 वर्षों बाद यह आंदोलन समाप्त हो गया।

विजय सिंह पथिक

  • पथिकजी का मूल नाम भूपसिंह था।
  • इनका जन्म 1873 ई. में उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर जिले में हुआ।
  • ये क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के लिए राजस्थान आए थे। साधु सीतारामदास ने इनसे प्रभावित होकर बिजोलिया आन्दोलन का नेतृत्व इन्हें सौंप दिया था।
  • पथिकजी ने किसानों को जागरुक करने के लिए ‘सेवा समिति‘ की स्थापना की।
  • विजय सिंह पथिक ने विद्या प्रचारिणी सभा का गठन किया।
  • पथिकजी ने 1917 ई. में ‘ऊपरमाल किसान पंच बोर्ड की स्थापना भी की थी।
  • इन्होंने गोपालसिंह खरवा के साथ मिलकर ‘वीर भारत समाज‘ संस्था की स्थापना की।
  • विजयसिंह पथिक ने रामनारायण चौधरी व हरिभाई किंकर के साथ मिलकर वर्धा में 1919 में ‘राजस्थान सेवा संघ‘ की स्थापना की।
  • पथिकजी ने 1921 में अजमेर से नवीन राजस्थान (तरूण राजस्थान) समाचार पत्र निकाला।
  • पथिकजी ने कानपुर से प्रकाशित ‘प्रताप’ समाचार पत्र (गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा सम्पादित) के माध्यम आंदोलन को अखिल भारतीय रूप दिया।
  • इनको राजस्थान में किसान आंदोलन का जनक कहा जाता है।

2. शेखावाटी में किसान आन्दोलन

  • इस राजस्थान में किसान आंदोलन में सबसे ज्यादा जाट शामिल थे।
  • शेखावाटी आन्दोलन के मुख्य कार्यकर्ता रामनारायण चौधरी, ठाकर देशराज, मास्टर चन्द्रभान, चौधरी हरिसिंह, हरलालसिंह खर्रा, किशोरी देवी, उत्तमा देवी आदि थे।
  • 1931 ई. में राजस्थान जाट क्षेत्रीय सभा की स्थापना की गई। इसके तत्त्वावधान में 1933 ई. में पलसाना में जाट सम्मेलन आयोजित कर बढ़ी हुई लगान का विरोध किया गया।
  • शेखावाटी में कटराथल गाँव में 25 अप्रैल, 1934 ई. को किशोरी देवी (हरलालसिंह खर्रा की पत्नी) के नेतृत्व में लगभग 10,000 जाट महिलाओं ने किसान आंदोलन में भाग लिया। इसमें उत्तमा देवी मुख्य वक्ता थी।

खूडी हत्याकाण्ड

1935 ई. में धरने पर बैठे किसानों पर कैप्टन वैब ने लाठियाँ चलवाई, जिसमें 4 किसान मारे गये और 100 घायल हुए।

कूदण हत्याकाण्ड

सीकर के कूदण गाँव में कैप्टन वैब ने गोलियाँ चलाई, जिसमें तीन लोग मारे गये। इसके विरोध में 26 मई, 1935 को सीकर दिवस मनाया गया।

3. बेगूं किसान आंदोलन

  • यह राजस्थान में किसान आंदोलन चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित ‘बेगूं‘ नामक स्थान पर हुआ था।
  • इस आंदोलन का नेतृत्व रामनारायण चौधरी ने किया था।
  • किसानों ने जागीरदारों के विरुद्ध 1921 ई. में मेनाल में इस आंदोलन की शुरुआत की और विजयसिंह पथिक को नेतृत्व सौंपा। कुछ समय बाद पथिकजी ने इसका नेतृत्व रामनारायण चौधरी को सौंप दिया।
  • 1923 ई. में किसानों व ठाकुर अनूपसिंह के मध्य समझौता हुआ लेकिन सरकार ने इसे ‘बोल्शेविक समझौता’ कहकर रद्द कर दिया।
  • बेगूं में लाग-बाग की जाँच हेतु ट्रेंच आयोग का गठन किया गया।
  • 13 जुलाई, 1923 में गोविन्दपुरा में किसानों की सभा पर सेना द्वारा लाठीचार्ज करने पर रूपाजी व कपाजी धाकड़ शहीद हो गये।
  • पथिकजी पुनः इस आंदोलन से जुड़े। अंततः 1925 में समझौता हो गया।
  • समझौते के तहत लाटा-कूंता प्रथा समाप्त कर भूमि बन्दोबस्त लागू कर दिया गया और कई लागे व बेगार को समाप्त कर दिया गया।

4. अलवर किसान आंदोलन

  • यह राजस्थान में किसान आंदोलन तत्कालीन अलवर रियासत में हुआ था।
  • यहाँ भू-राजस्व ठेका प्रणाली पर सौंपा हुआ था, जिसे ‘इजारा’ कहा जाता था। इसके तहत ऊँची बोली लगाने वाले को भूमि निश्चित अवधि के लिए दे दी जाती थी।
  • 14 मई, 1925 ई. को अलवर के निमूचणा गाँव में किसानों की सभा पर अंधाधुंध फायरिंग की गई। इसमें लगभग 156 किसान मारे गये।
  • गाँधीजी ने नीमूचणा हत्याकाण्ड को ‘जलियावाला बाग हत्याकाण्ड’ से बढ़कर बताया।
  • इस आन्दोलन में अधिकांश किसान राजपूत थे।
  • नवम्बर, 1925 में सरकार ने किसानों की माँगे मान ली और आंदोलन समाप्त हो गया।
  • अलवर में किसानों की फसलों को सूअरों द्वारा नुकसान पहुँचाने पर भी उन्हें मारने पर प्रतिबंध था। इसके विरोध में 1921 ई. में मेव किसानों द्वारा आंदोलन करने पर सूअर मारने की अनुमति मिल गई। मेव किसानों ने बढ़ी हई लगान देने से मना करते हुए 1952 ई. में आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। इसका नेतृत्व मोहम्मद अली और यासीन खाँ ने किया।
राजस्थान में किसान आंदोलन
राजस्थान में किसान आंदोलन
राजस्थान में किसान आंदोलन - महत्वपूर्ण प्रश्न
  • शेखावटी किसान आंदोलन का नेतृत्व किसने किया था?
  • बिजोलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व किसने किया था?
  • कोनसा राजस्थान मे किसान आंदोलन था, जिसमे ज्यादातर किसान राजपूत थे?
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